Wednesday, February 11, 2026

कठपुतली

जब मन कियहसा दिया

और जब मन कियारुला दिया

 

क्या कहते हैं उसको

…कठपुतली समझ के रखा है

जैसे मन चाहा वैसे घुमा लिया |

 

कुछ डोरियाँ थी... जिनके सहारे,

तुम मुझको सहलाते रहे,

मैं शर्माती रही प्यार से,

और देखती रही इक आस से |

 

जो इतना प्यार से तुमने सहलाया,

मुझ कठपुतली को इंसान बनाया |

दिल में भरा वो अरमान बाहर आया

और फिर एक दिन तुमने उसी डोर से,

खींच के ज़ोर से…

…जो मेरा गला दबाया...

मेरे सामने कुछ ऐसा अँधेरा आया,

समेट लेती खुद को, वो मौका ही नहीं आया !!

 

गिरी ऐसे ज़मीन पर लाश की तरह,

जाते हुए देखती रही तुम्हे...

बेजान इंसान की तरह |

डोरियाँ जो टूटी, सो टूटी,

मानो जैसे मैं खुद से रूठी |

 

तुझे इतना खुश देख के,

आँखें चुरा लेती हूँ मैं |

अब सिर्फ देखती हूँ तेरी दुनिया को

…बेजान आँखों से मैं |

 

नज़र लग जाए मेरी,

कहीं खुशियों को तेरी !

पत्थर हो गयी इसलिए

छोटी से कठपुतली तेरी…! 

©Dimple Guliani

Saturday, January 17, 2026

समय की चाल


समय का क्या है,
बड़ा धोखेबाज़ है,
यह रुकता है,
और ही यह थकता है |

चाहो तो आज़मा लो,
हँस कर इसे दिखा दो ,
अगले ही पल रुला देगा,
तुम्हें तुम्हारी औकाद बता देगा |

जो समय बुरा जाए,
तो दीमक की तरह खा जाए,
और अच्छा जाए,
तो फूलों सा निखार जाए |

मैं घर से बाहर निकली,
इक ताला बड़ा लगाकर,
सोचा क़ैद कर लूँगी,
इसे अपना यार बनाकर... !

मेरे वापस आने की देर थी,
घर के अंदर से निकल कर,
हवा हो गया आसमान में वो,
अच्छा वक्त बदल गया, कैसा हैवान है वो!

मुझसे वह दूर जा रहा था,
कुछ बुरा होने का आभास दिला रहा था,
पकड़ती रही इक कोने से मैं
निकाल गया दूसरी और से वो |

झूठ नहीं कह रही मैं,
हाथों की लकीरें बता रही हैं,
बुरे वक्त में जले जो हाथ मेरे,
वो वापस उसको बुला रहे हैं |

कोई तो समय को कह दो,
इतना घमंड करे,
मैं भी इंसान हूँ,
मुझपे कभी तो रहम करे |

Friday, September 16, 2011

मेरे यार
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ऐसे मत घूरो मुझे,
गल्ती  मेरी, मारो मुझे,
चुप रहकर यूं इम्तिहान न लो,
कुछ कहते नहीं, पहचान तो लो |

मुस्कुरा कर मुझे आभास तो दो,
खो कर मिलने वाला एहसास तो दो,
मेरे लिए सबसे खास तुम हो
और दिल के पास तुम हो |

मानती हूँ खता कर दी मैंने,
कुछ महीने से आई नहीं मिलने,
क्या करूँ छत पर कोई आने नहीं देता
और घर की खिड़की से तू नहीं दिखता |

खत्म हो जाएगी तकरार,
गर प्यार से देख लो एक बार,
सही नहीं जाती टकटकी की मार,
ओ चाँद! तेरे जैसा नहीं कोई यार || 

~ ~ ~

Friday, July 1, 2011

एहसासों कि वर्जिश 

वो कहता है... "तुम्हारी तलाश 
ख़त्म हो गयी
इसलिए तुमने लिखना छोड़ दिया" | 

क्या बताऊ उसको
कि सपनों ने मेरी गली
आना छोड़ दिया |

भाव मेरे दरवाज़े पर
दस्तक नहीं देते,
इसलिए मैंने भी उनकी
गली जाना छोड़ दिया |

क्यूँ न ऐसा कुछ किया जाए,
'एहसासों को थोड़ा सा
धोखा दिया जाए' ... |

मुझे उनकी तलाश में नहीं,
उनको मेरी खोज में लगाया जाए |
पहली बार ही सही,
आज उनसे कुछ काम कराया जाए ||

~~~ *** ~~~

Monday, June 6, 2011

पानी की तरह बनना है मुझे,
आज फिर घुलना है मुझे |
 हर चीज़ में समाना है,
और हर चीज़ को अपना बनाना है |

कोई दुश्मन न रहे,
कोई अपना-पराया न रहे |
कोई अंतर न रहे,
और कोई अन्दर न रहे |

बस बहती चलू मैं
निरंतर इक अभ्यास की तरह |   
छुं जाऊ सबको फिर से,
इक प्यास की तरह |

अपना रास्ता स्वयं बनाना है,
हर रंग में मिल जाना है |
सागर से बतियाना है,
अंत में... "आँखों से बह जाना है" ||

Wednesday, April 13, 2011



काले ज़ार रंग से मुझे प्यार हो गया,
कमरे में फैला दो ये मेरा यार हो गया,
परछाइयों से नाता नहीं जबसे उनसे तकरार हो गया |

रौशनी में परछाइयाँ नज़र आती हैं,
जो मुझे न चाहते हुए भी उससे मिलाती हैं,
इसलिए अँधेरे को मैंने रिश्तेदार बना लिया
और परछाइयों से अपना दामन छुड़ा लिया |
.
.
.
पर देखा... कुछ रिश्ते तो कभी नहीं छूटते,
रौशनी तो क्या, अंधेरों में भी परछाइयों से नाते नहीं टूटते ||

Thursday, February 17, 2011


न जाने क्यों नज़र लग जाती है |
अपनी ही बात कहके वो पछताती है ...
... चार लोगों के सामने 
जब वो अपने प्यार पर इतराती है |

अपने आप से भी दिन-रात छुपाती है |
हर रात उसको खुद से ज़्यादा चाहती है |
मन की खिड़की हमेशा उसे बताती है ...
तू उसे फज़ूल में ही चाहती है |

फूलों की तरह फूली नहीं समाती है |
जब ख्वाब में उससे मिलने जाती है |
टूटे शीशों की तरह भिखर जाती है ...
... जब उसको मिल के आती है |

आँसुओं को सहलाती है
और खुद को अब रोज़ बताती है ...
... अपने प्यार को ज़्यादातर,
अपनी ही नज़र लग जाती है || 

Tuesday, December 7, 2010

अंदाज़े से
~~~~~~

आधी ज़िन्दगी बीत गयी,
इसका जवाब ढूढने में,
कि ये "अंदाजा" क्या होता है |

रोज़ माँ से पूछती थी, "ये मसाला कितना डाला",
तो वो बोलती थी बस "अंदाज़े से" |

मैं पूछती रहती, "एक चमच या दो",
वो कहती, "बस बेटा अंदाज़े से" |

सोच सोच के मेरा दिमाग परेशान हो जाता,
ये समझ नहीं आता कि
"अंदाज़े से" होता कितना है... |

हमेशा उस दिन से डरती थी,
जिस दिन पहली बार किसी के लिए कुछ बनाउंगी
और वो भी बिना माँ के भाषण के |

लो जी वो दिन भी आ गया...

खाना बनाया और सारे मसाले भी डाले,
कुछ आधा चमच और कुछ पूरा चमच |

देखते ही देखते खाना तैयार हो गया
और फिर माँ से यु ही बात हुयी...
हाल चाल से पहले उनहोंने एक सवाल पुछा,
"खाना कैसा बना?"
मेरा जवाब था, "अच्छा लगा सबको" |
उनका अगला सवाल था, "मसाले कितने डाले"
और हस्ते हुए कहा मैंने ... "अंदाज़े से" ... || :-)








Sunday, August 22, 2010

शायद
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तुझे हासिल करने का जूनून नहीं था दिल में,
बस प्यार करने की तमन्ना थी ...
... शायद इसलिए पा न सके तुझे हम,
और बस प्यार की ज्योत जलाते रहे ...

ख़ुशी देना मुमकिन न था,
बस तुझे खुश देखना चाहते थे ...
... शायद इसलिए तू गेरो में खुश रहा,
और हम तेरी ख़ुशी की दुआ ही मांगते रहे ...

Tuesday, August 17, 2010

रात
*****
ये रात बड़ी बईमान है,
पर तुम पे सबसे ज्यादा मेहरबान है ...
तुम्हे हर रात खूबसूरत बनाती है,
और मुझे तुम्हारी याद में तड़पाती है ...
यह तो शुक्र है हर रात में चाँद  नज़र आ जाता है,
और मुझे तुम्हारी झलक उसमें दिखला जाता है ...
शायद इसलिए अमावस्या की रात के बाद,
तुझे उस चाँद में ढूँढने में अलग ही मज़ा आता है ...

Sunday, August 15, 2010

मिसाल

साफ़ सीधी सी बात है,
आज मेरा मन उदास है...

जिसे कहती है दुनिया दोस्त
वो तो मेरे पास है...
पर उसकी परेशानी देख के,
आज दिल में बस इक बात है | 

बहुत अरसे बाद आज,
किसिके दुःख से फिर मन टूटा है,
ऐसा लगता है ...
... रब्ब मुझसे ज्यादा शायद तुझसे रूठा है,  
तुने जो दर्द सहने में यह महारथ हासिल की है,
उसी रब्ब की कसम मैंने हर मोड़ पे...
तुझसे ही हिम्मत की मिसाल ली है ||