Wednesday, February 11, 2026

कठपुतली

जब मन कियहसा दिया

और जब मन कियारुला दिया

 

क्या कहते हैं उसको

…कठपुतली समझ के रखा है

जैसे मन चाहा वैसे घुमा लिया |

 

कुछ डोरियाँ थी... जिनके सहारे,

तुम मुझको सहलाते रहे,

मैं शर्माती रही प्यार से,

और देखती रही इक आस से |

 

जो इतना प्यार से तुमने सहलाया,

मुझ कठपुतली को इंसान बनाया |

दिल में भरा वो अरमान बाहर आया

और फिर एक दिन तुमने उसी डोर से,

खींच के ज़ोर से…

…जो मेरा गला दबाया...

मेरे सामने कुछ ऐसा अँधेरा आया,

समेट लेती खुद को, वो मौका ही नहीं आया !!

 

गिरी ऐसे ज़मीन पर लाश की तरह,

जाते हुए देखती रहे तुम्हे...

बेजान इंसान की तरह |

डोरियाँ जो टूटी, सो टूटी,

मानो जैसे मैं खुद से रूठी |

 

तुझे इतना खुश देख के,

आँखें चुरा लेती हूँ मैं |

अब सिर्फ देखती हूँ तेरी दुनिया को

…बेजान आँखों से मैं |

 

नज़र लग जाए मेरी,

कहीं खुशियों को तेरी !

पत्थर हो गयी इसलिए

छोटी से कठपुतली तेरी…! 

©Dimple Guliani

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