समय का क्या है,
बड़ा धोखेबाज़ है,
यह न रुकता है,
और न ही यह थकता है |
चाहो तो आज़मा लो,
हँस कर इसे दिखा दो ,
अगले ही पल रुला देगा,
तुम्हें तुम्हारी औकाद बता देगा |
जो समय बुरा आ जाए,
तो दीमक की तरह खा जाए,
और अच्छा आ जाए,
तो फूलों सा निखार आ जाए |
मैं घर से बाहर निकली,
इक ताला बड़ा लगाकर,
सोचा क़ैद कर लूँगी,
इसे अपना यार बनाकर... !
मेरे वापस आने की देर थी,
घर के अंदर से निकल कर,
हवा हो गया आसमान में वो,
अच्छा वक्त बदल गया, कैसा हैवान है वो!
मुझसे वह दूर जा रहा था,
कुछ बुरा होने का आभास दिला रहा था,
पकड़ती रही इक कोने से मैं
निकाल गया दूसरी और से वो |
झूठ नहीं कह रही मैं,
हाथों की लकीरें बता रही हैं,
बुरे वक्त में जले जो हाथ मेरे,
वो वापस उसको बुला रहे हैं |
कोई तो समय को कह दो,
इतना घमंड न करे,
मैं भी इंसान हूँ,
मुझपे कभी तो रहम करे |